PM मोदी ने परिसीमन पर दक्षिण भारत के हर राज्य का दूर किया भ्रम, कहा- किसी के साथ नहीं होगा भेदभाव, मैं गारंटी देता हूं

प्रधानमंत्री ने कहा कि हम भ्रम में न रहें, हम उस अहंकार में न रहें कि हम देश की नारी शक्ति को कुछ दे रहे हैं। जी नहीं। यह उसका हक है। हमने कई दशकों से उसे रोका है। आज उसका प्रायश्चित कर के उस पाप से मुक्ति पाने का यह मौका है। पीएम मोदी ने सभी दलों से अपील करते हुए कहा कि मैं इतना ही कहूंगा कि इसको राजनीति के तराजू से न तौलें…

नईदिल्ली (ए)। संसद के विशेष सत्र में आज महिला आरक्षण कानून से जुड़े तीन अहम संशोधन विधेयक पेश किया गया। इन प्रस्तावों के तहत वर्ष 2029 से लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने की व्यवस्था की जाएगी। इसके साथ संसद में सीटों की संख्या को भी बढाया जाना है। पीएम मोदी इस दौरान सदन में बोलते हुए सभी राज्यों को भरोसा दिलाया कि किसी भी राज्य के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा।

पीएम मोदी ने कहा कि हमारी एक्टिविस्ट, संविधान के जानकारों से बात हुई। यहां बैठकर हमारे संविधान ने किसी को टुकड़ों में सोचने का अधिकार ही नहीं दिया। एक राष्ट्र के रूप में विचार करना हमारा दायित्व है। चाहे कश्मीर हो या कन्याकुमारी, हम एक साथ सोच सकते हैं एक साथ निर्णय कर सकते हैं। सिर्फ राजनीतिक लाभ लेने के लिए बवंडर खड़ा किया जा रहा है। मैं इस सदन से कहना चाहता हूं कि चाहे दक्षिण हो, उत्तर हो, छोटे राज्य हों या बड़े राज्य हों, परिसीमन प्रक्रिया किसी के साथ भी भेदभाव नहीं करेगी।

पीएम मोदी ने सभी दलों को भरोसा देते हुए कहा, यह निर्णय प्रक्रिया किसी के साथ अन्याय नहीं करेगी। जिनके कालखंड में जो परिसीमन हुआ, वह अनुपात उनके समय से चला आ रहा है, उस अनुपात में भी कोई बदलाव नहीं होगा। अगर गारंटी कहिए तो मैं गारंटी देता हूं। वादा की बात करें तो वादा करता हूं। जब नीयत साफ है तो हमें शब्दों का खेल करने की जरूरत नहीं हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि हम भ्रम में न रहें, हम उस अहंकार में न रहें कि हम देश की नारी शक्ति को कुछ दे रहे हैं। जी नहीं। यह उसका हक है। हमने कई दशकों से उसे रोका है। आज उसका प्रायश्चित कर के उस पाप से मुक्ति पाने का यह मौका है। पीएम मोदी ने सभी दलों से अपील करते हुए कहा कि मैं इतना ही कहूंगा कि इसको राजनीति के तराजू से न तौलें। हम जब भी कुछ निर्णय लेते हैं उसका आधा जिम्मा जो उठा रहे हैं, उनका भी कुछ हक बनता है। संख्या के संबंध में भी पहले कहते थे कि जो संख्या थी, उसे बढ़ाने की बात ही चलती थी।

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