मेरी माँ ने मुझे रोटी बनाने से लेकर रोटी कमाने तक के लिए समर्थ बनाया है : संयुक्त कलेक्टर दिव्या वैष्णव

सबसे पहले सभी पाठकों को अंतराष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनायें…महिलाओं के लिए कोई एक दिन विशेष नहीं है ,पीढ़ी दर पीढ़ी महिलाएं अनेक संघर्षों का सामना करते हुए आगे बढ़ रही हैं। भले ही संघर्ष की प्रकृति भिन्न-भिन्न हो अगर मानव जीवन है तो संघर्ष निश्चित है। परिस्थितियां या तो हमें तोड़ देती है या फिर हम दुनिया को तोड़ दे इतनी हिम्मत प्रदान करती है, ये हम पर निर्भर करता है की कि हम परिस्थितियों का लाभ किस प्रकार उठाते हैं। मैं हमेशा से मानती हूँ की मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है कि मैं एक महिला हूँ और जीवन के हर क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रही हूँ, हर भूमिकाओं को निभाते हुए अपने कर्तव्य का पालन कर रही हूँ, जीवन के हर पहलुओं को स्वीकार करते हुए हुए जीवन का आनंद उठा रही हूँ…मुझे लगता है कि इतना सबकुछ मई इसीलिए ही कर पा रही हूँ क्योंकि मई एक महिला हूँ और एक महिला (माँ) ने मुझे रोटी बनाने से लेकर रोटी कमाने तक के लिए समर्थ बनाया है, जीवन जीना सिखाया है।

अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर “रोटी बनाने से लेकर रोटी कमाने तक” के सफर के कुछ अनुभव और कुछ मन की बातें आप सभी से साझा कर रही हूँ-

-“रोटी बनाना” अपने आप में एक सम्पूर्ण जिम्मेदारी है। चाहे आप स्त्री हों या पुरुष ,चाहे आप विवाहित हो या अविवाहित, चाहे आप किसी मेड की मदद ले रहे हो या नहीं…सारांश यह है कि घर की जिम्मेदारी में आपका हिस्सा हो , प्रत्यक्ष दिखने वाले कामों में आपका सहयोग हो, समय प्रबंधन में आपका योगदान हो….एक बेहतर व्यवस्था के लिए कार्य आबंटन आवश्यक है लेकिन ये काम सिर्फ इसका है वो काम सिर्फ उसका है इस बात पर जोर देना सही नहीं है…अगर आप एक दुपहिया/चार पहिया वहां चलाती हैं तो उससे संबंधित सभी प्रक्रिया (पेट्रोल के भाव, रिपेयरिंग, सर्विसिंग, इंश्योरेंस आदि) की जानकारी कम से कम सतही तौर पर होनी ही चाहिए, अगर आप घर का खाना बनाते हैं तो सब्जी राशन के भाव सिलिंडर आदि जानकारी कम से कम सतही तौर पर होनी ही चाहिए…सबसे महत्वपूर्ण है कि आप जो भी कर रहे हैं उसके लिए अपडेटेड रहें

-“रोटी कमाना” केवल पैसे कमाने तक सीमित नहीं है…कमाए हुए पैसे का सही एवं नियोजित सदुपयोग , आर्थिक मामलों में हिस्सेदारी, आर्थिक निर्णयों में सहभागिता भी जरुरी है, घर के बाहर के काम भी उतने ही चुनौतीपूर्ण है जितने घर के भीतर के काम…दोहरी जिम्मेदारी को आपसी सहयोग से बांटा जा सकता है।

-“तुलना ना करना “- हर व्यक्ति का अपने आप में भिन्न व्यक्तित्व है, कुछ कमियां कुछ अच्छाईयां हैं…किसी विशेष लक्ष्य के लिए एक स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा आवश्यक है परन्तु हर बार तुलना करना उचित नहीं है…प्रत्येक व्यक्ति का प्रयास, प्रत्येक व्यक्ति का फैसला अपने जगह सही है।

आदर्श व्यक्तित्व से हम प्रेरणा लेते हैं , उनसे तुलना नहीं करनी चाहिए…अपनी कमी को दूर करते हुए खुद से प्रतिस्पर्धा करते हुए खुद को निखारना जरुरी है।

 

-“स्वीकार करना ” जब परिस्थिति विपरीत होती है तो हमारे धैर्य एवं सकारात्मकता की परीक्षा होती है ..बात यहाँ इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने या नहीं होने की नहीं है बल्कि बात जितना जल्दी जीवन के उस चरण को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ने की है…अपने अंदर की शांति और ऊर्जा को अनावश्यक खर्च करना सही नहीं है ..परिवर्तन शाश्वत है, समय हमेशा एक सा नहीं होता है…उंचाईयों के डर का मजा लीजिए और निचे गिरते हुए निर्वात से सामना भी कीजिए तभी मध्य में स्थिर रह पाएंगे।

“खुद को समय दीजिये ” जब हम स्वस्थ्य होते हैं तब हमें दुनिया भर की चिंता सताती है लेकिन जब हमरी तबियत ठीक नहीं होती तो केवल एक ही इच्छा होती है की बस कैसे भी करके तबियत हिक हो जाए…हमारे शरीर को हमसे ज्यादा कोई नहीं समझ सकता है…शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य ही जीवन की कुंजी है…लक्ष्य कैसा भी हो अगर आप तन से और मन से स्वास्थ्य हैं तो आप जरूर अच्छा प्रदर्शन करेंगे।

ऊपर कही ये बातें हम सभी जानते हैं और समझते भी हैं पर कहीं न कहीं जब इन बातों को आजमाने (क्रियान्वयन) की स्थिति आती है तो हम कमजोर पड़ जाते हैं…..

मेरी खुद से भी और आप सभी से भी यही अपील है कि हम सशक्त हैं, हम ऊर्जावान है, हमारा अपना दृष्टिकोण है, सामर्थ्य है तभी तो यहाँ तक पहुंचे हैं लेकिन जीवन के उतार-चढाव में हमें डटे रहना है, मन मजबूत रखना है, पॉजिटिव सोच के साथ आगे बढ़ते रहना है…अपने जीवनी की लेखनी आप ही हैं, अपने जीवन के सर्वोत्तम लेख के लिए हमेशा तत्पर रहिये।

(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष लेख)

दिव्या वैष्णव- संयुक्त कलेक्टर,अवर सचिव लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग (छग)

 

 

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