सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युदंड पाए दोषी को किया बरी, कहा- जब जिंदगी दांव पर हो, तब ईमानदारी से काम लेना जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामले में मृत्युदंड की सजा काट रहे व्यक्ति को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब इंसानी जीवन दांव पर हो तो सबूत पूरी तरह साफ और पुख्ता होने चाहिए। गवाहों के बयानों में विरोधाभास होने के कारण आरोपी का दोष साबित नहीं हो सका…

 

 

नईदिल्ली (ए)। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि जब इंसानी जिंदगी दांव पर हो और कीमत खून से चुकानी पड़े, तो ऐसे मामलों को पूरी ईमानदारी से निपटाना जरूरी होता है। शीर्ष कोर्ट ने 2013 में अपने परिवार की हत्या के दोषी एक व्यक्ति को बरी किया, जो पहले मृत्युदंड की सजा काट रहा था।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप मेहता की तीन सदस्यीय बेंच ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर किया, जिसमें आरोपी की फांसी की सजा को बरकरार रखा गया था। शीर्ष कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही में बड़ा विरोधाभास पाया। इसलिए यह साफ नहीं हो पाया कि आरोपी ने सच में अपराध किया है या नहीं।

कोर्ट ने कहा, फिर दोहराते हुए हम यह कहना चाहते हैं कि जब इंसानी जीवन दांव पर हो और कीमत खून की हो, तब पुख्ता सबूत होने चाहिए और उसमें कोई चूक नहीं होनी चाहिए। ऐसे मामलों में पूरी ईमानदारी से काम लेना जरूरी होता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में आगे कहा, हम आरोपी (अपीलकर्ता) को दोषी नहीं ठहरा सकते क्योंकि उसका अपराध साबित नहीं किया गया है।

अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि बलजिंदर नाम के व्यक्ति ने 29 नवंबर 2013 को कथित तौर पर अपनी पत्नी, छोटे बच्चों, साली की हत्या की थी और दो अन्य को घायल कर दिया था। बलजिंदर कुछ दिन पहले अपनी सास के घर गया था और उसने पैसों को लेकर झगड़े के चलते अपनी पत्नी और बच्चों को जान से मारने की धमकी दी थी। बताया गया कि उसकी पत्नी उसे छोड़कर चली गई थी।

दरअसल, बलजिंदर और उसकी बहन को उनकी बहन के पूर्व पति से तलाक के समझौते में 35,000 रुपये मिलने थे। बलजिंदर की सास ने बहन के पति के लिए गारंटर के रूप में हस्ताक्षर किए थे, और जब वह पैसा नहीं मिला, तो झगड़े शुरू हो गए। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि पैसे को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि बलजिंदर ने पत्नी और बच्चों को जान से मारने की धमकी दी।

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने गवाहों की गवाही में समय-समय पर दिए गए बयानों में अंतर और सुविधा के अनुसार किए गए बदलावों का जिक्र किया। कोर्ट ने कहा, अभियोजन पक्ष के दो मुख्य गवाहों की बातों में समय-सीमा और घटना की मूल बातें एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं। ये विरोधाभास गंभीर हैं और अभियोजन की पूरी कहानी में एक बड़ा झोल पैदा करते हैं। इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने बलजिंदर को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button